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विश्व के दुर्लभ पुरातात्विक स्थलों में शामिल सारण के चिरांद के विविध पक्षों पर अकादमिक गहन विमर्श की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने विभिन्न संस्थानों के साथ मिलकर 17 जनवरी 2026 को एक राज्यस्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। संगोष्ठी का विषय, चिरांद : पुरातात्त्विक साक्ष्य, लोकस्मृति और सभ्यतागत निरंतरता का विमर्श
रखा गया है। जेपी विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग, इंतिहास संकलन समिति, प्रज्ञा प्रवाह की इकाई चिति एवं चिरांद विकास परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के प्रसिद्ध पुरातत्वविद्, संस्कृत साहित्य विशेषज्ञ एवं इतिहास कार शामिल होंगे। संगोष्ठी के संरक्षक जयप्रकाश विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेई जी, सह संरक्षक प्रो अजीत कुमार जी, अध्यक्ष इतिहास संकलन समिति, उत्तर बिहार बनाए गए हैं। वहीं संगोष्ठी में प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्रीय संयोजक श्री देवदत्त प्रसाद जी, चिति के अध्यक्ष प्रो लक्ष्मी नारायण जी, प्रो कृष्ण कन्हैया जी, अध्यक्ष, इतिहास विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा संगोष्ठी के वक्ता हैं।
संगोष्ठी के संयोजक डॉ रितेश्वर तिवारी जी, स्नातकोत्तर इतिहास विभाग हैं।
उल्लेखनीय है कि बिहार के सारण क्षेत्र में स्थित चिरांद भारतीय उपमहाद्वीप के उन विरल पुरातात्त्विक स्थलों में से एक है जहाँ नवपाषाण, ताम्रपाषाण तथा प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल की सांस्कृतिक परतें एक सतत क्रम में उपलब्ध होती हैं। यह स्थल केवल उत्खनन से प्राप्त भौतिक अवशेषों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की जीवन–पद्धति, लोकविश्वास, धार्मिक आस्थाएँ और सामाजिक व्यवहार आज भी अतीत की स्मृतियों को जीवित रखते हैं। इसी कारण चिरांद को एक ऐसे जीवंत सभ्यतागत केंद्र के रूप में देखा जा सकता है जहाँ भौतिक और अमूर्त संस्कृति एक-दूसरे में अंतर्गुंफित होकर भारतीय सभ्यता की दीर्घकालिक निरंतरता का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।
यह स्थान कभी भी निर्जन नहीं हुआ। यहां जलप्रबंधन एवं उत्तम कृषि के प्रमाण नवपाषाण काल से ही मिले हैं। इस प्रकार गंगा, सरयू और सोन नद जैसे सदानीरा नदियों के संगम पर स्थित यह स्थान भारत के प्राचीन सतत विकास का माडल स्थल है।
भारतीय इतिहासलेखन की परंपरा में प्रायः पुरातात्त्विक साक्ष्यों को ही प्रमाणिक मानकर लोकस्मृति, जनश्रुति और मौखिक परंपराओं को इतिहास के दायरे से बाहर रखा गया है। इस दृष्टिकोण के कारण ग्राम–आधारित सभ्यताओं, स्थानीय ज्ञान–प्रणालियों और सांस्कृतिक निरंतरताओं की समग्र समझ विकसित नहीं हो सकी। चिरांद जैसे स्थल इस प्रवृत्ति को चुनौती देते हैं, क्योंकि यहाँ आवास–संरचनाओं, उपकरणों, अस्थि–अवशेषों और कृषि संकेतों के साथ-साथ लोककथाएँ, स्थल–स्मृति, धार्मिक अनुष्ठान और पर्यावरण–अनुकूल जीवन–शैली भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक संकेत प्रदान करती हैं।
इस सेमिनार की संकल्पना चिरांद को केवल एक पुरातात्त्विक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्मृति के केंद्र के रूप में पुनर्पाठ करने का प्रस्ताव रखती है। इसका उद्देश्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों और लोकस्मृति के बीच संवाद स्थापित करते हुए यह दिखाना है कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता केवल राजवंशों या नगरों से नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, लोकाचार और सांस्कृतिक व्यवहार से निर्मित हुई है। इस दृष्टि से चिरांद भारतीय ज्ञान–परंपरा की उस निरंतर धारा का प्रतीक बनता है, जहाँ प्रकृति, समाज और संस्कृति के बीच संतुलन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।





















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