पुरातात्त्विक साक्ष्य, लोकस्मृति पर JPU में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।

2 days ago 13
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इतिहास विभाग, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा; इतिहास संकलन समिति, उत्तर बिहार; चिति तथा चिरांद विकास परिषद के संयुक्त तत्वावधान में “चिरांद : पुरातात्त्विक साक्ष्य, लोकस्मृति और सभ्यतागत निरंतरता” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य एवं विचारोत्तेजक आयोजन विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी का उद्देश्य चिरांद को केवल एक पुरातात्त्विक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की दीर्घकालीन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक निरंतरता के जीवंत केंद्र के रूप में पुनः स्थापित करना था। संगोष्ठी में देश के छह विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शोधार्थियों, पुरातत्वविदों, इतिहासकारों एवं विद्यार्थियों सहित लगभग 150 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

संगोष्ठी का उद्घाटन विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेई द्वारा किया गया। अपने उद्घाटन व्याख्यान में कुलपति ने भारतीय सभ्यता की अविच्छिन्न धारा पर बल देते हुए कहा कि गंगा–यमुना सभ्यता को किसी पृथक या असंबद्ध सांस्कृतिक इकाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह सिंधु–सरस्वती सभ्यता का ही स्वाभाविक, क्रमिक और ऐतिहासिक विस्तार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुरातात्त्विक साक्ष्य, बस्ती-नियोजन, कृषि एवं पशुपालन प्रणालियाँ, मृद्भांड संस्कृति, धार्मिक प्रतीकात्मकता और लोकस्मृतियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि भारतीय सभ्यता का विकास किसी विघटन से नहीं, बल्कि निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह के माध्यम से हुआ है। चिरांद जैसे स्थल इस दीर्घकालीन सभ्यतागत प्रक्रिया के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

बीज वक्तव्य प्रज्ञा प्रवाह से जुड़े कृष्ण कांत ओझा द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने चिरांद को भारतीय सांस्कृतिक चेतना, लोकस्मृति और राष्ट्रबोध के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सभ्यतागत केंद्र बताते हुए कहा कि ऐसे ऐतिहासिक स्थल केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक चेतना को दिशा देने वाले आधार हैं। उन्होंने चिरांद के संरक्षण और उसके बौद्धिक पुनर्पाठ की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ अभय कुमार सिंह ने किया।

संगोष्ठी के दौरान अनंत अशुतोष द्विवेदी, पुरातत्वविद्, ने सारण जनपद के पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि यह क्षेत्र नवपाषाणकाल से ही मानव बसावट, कृषि विकास और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उन्होंने विभिन्न पुरातात्त्विक अवशेषों के माध्यम से गंगा घाटी की प्राचीन जीवन-पद्धति और तकनीकी विकास को रेखांकित किया। वहीं डॉ. कर्ण कुमार ने चिरांद के ऐतिहासिक भूगोल और इतिहास-लेखन पर सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि चिरांद को केवल उत्खनन-स्थल के रूप में नहीं, बल्कि गंगा घाटी की सभ्यतागत संरचना को समझने की एक केंद्रीय कुंजी के रूप में देखा जाना चाहिए।

पटना विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मी नारायण ने अपने संबोधन में रामायण परंपरा, शिक्षा-पथ और चिरांद के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रामायण केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का नैतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक मार्गदर्शक है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि रामायण में वर्णित आश्रम-परंपरा, नदी-आधारित जीवन और सांस्कृतिक भूगोल गंगा घाटी के ऐतिहासिक परिदृश्य से गहराई से जुड़े हुए हैं और चिरांद इस सांस्कृतिक धारा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

इस एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन चार अकादमिक सत्रों में किया गया, जिनमें कुल 28 शोध पत्रों का वाचन हुआ। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. सईद रज़ा ने की। इन सत्रों में नवपाषाणकालीन संस्कृति, प्रारंभिक कृषि समाज, लोकस्मृतियाँ, सांस्कृतिक निरंतरता तथा भारतीय इतिहास-लेखन की पद्धतियों पर गहन और तथ्यपरक विमर्श हुआ।

कार्यक्रम के दौरान विधान परिषद सदस्य श्री सच्चिदानंद राय ने घोषणा की कि वे चिरांद पर एक समर्पित अध्ययन केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव विधान परिषद में प्रस्तुत करेंगे, जिसे विद्वानों ने ऐतिहासिक, दूरदर्शी और नीतिगत रूप से महत्वपूर्ण पहल बताया। समारोप सत्र का संचालन एवं आभार-प्रदर्शन डॉ. रितेश्वर नाथ तिवारी द्वारा किया गया। उन्होंने संगोष्ठी के निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि यह आयोजन चिरांद को भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के अध्ययन के केंद्र में पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास है।

कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि चिरांद की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत के संरक्षण, शोध, प्रलेखन और वैश्विक अकादमिक प्रस्तुतीकरण हेतु निरंतर, संगठित और बहुविषयक प्रयास किए जाएंगे। कार्यक्रम में संकायप्रमुख विज्ञान प्रो अशोक कुमार, प्रो राणा विक्रम सिंह, प्रो सिद्धार्थ शंकर, प्रो राजेश नायक, आर पी श्रीवास्तव, प्रो अशोक मिश्रा प्रो जीतेन्द्र पाण्डेय, डॉ अनुपम सिंह, डॉ प्रियंका डॉ पप्पू कुमार सहित विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर उपस्थित रहे।