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• पीएमएसएमए से हाई-रिस्क गर्भावस्था की समय पर पहचान।
• अब महीने में तीन बार आयोजित किया जाता है विशेष शिविर।
• हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान के लिए स्वास्थ्य विभाग तत्पर।
• अब एपीएचसी स्तर पर मिल रही है सेवाएं।
छपरा। “अगर उस दिन दोबारा जांच के लिए नहीं बुलाया जाता, तो शायद मेरी तबीयत बिगड़ती चली जाती।” यह कहना है छपरा सदर प्रखंड की गर्भवती महिला प्रियंका का। प्रियंका बताती हैं कि पहले वह महीने में एक बार ही गर्भावस्था की जांच कराती थीं, लेकिन प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) के तहत अब महीने में तीन बार होने वाली जांच के कारण दूसरी बार जांच में उनका ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर पर पाया गया। डॉक्टरों ने तुरंत दवा दी और उन्हें उच्च संस्थान रेफर किया। समय रहते इलाज मिलने से आज उनकी गर्भावस्था सुरक्षित है। प्रियंका जैसी कई महिलाओं के लिए जांच की संख्या बढ़ना जीवनरक्षक साबित हो रहा है। यही वजह है कि जिले में मातृ स्वास्थ्य की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है।
मां बनना हर महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। लेकिन गर्भावस्था के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही मां और शिशु—दोनों के लिए खतरा बन सकती है। इसी जोखिम को कम करने और मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) अब एक मजबूत और लाइफ सेविंग पहल के रूप में उभर कर सामने आया है। इस अभियान के तहत हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान और इलाज से न सिर्फ गर्भवती महिलाओं की जान बच रही है, बल्कि नवजात शिशुओं को भी सुरक्षित जीवन मिल रहा है।
पहले जहां गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच हर महीने सिर्फ 9 तारीख को विशेष शिविर लगाकर की जाती थी, वहीं अब स्वास्थ्य विभाग ने इसे और प्रभावी बनाते हुए हर महीने 9, 15 और 21 तारीख को विशेष शिविर आयोजित करने की व्यवस्था की है। जांच की आवृत्ति बढ़ने से गर्भावस्था के दौरान आने वाले जोखिम—जैसे उच्च रक्तचाप, खून की कमी (एनीमिया), शुगर और अन्य जटिलताओं—की पहचान समय रहते हो पा रही है।
आंकड़े बताते हैं अभियान की सफलता
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार बिहार में अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 के बीच 8 लाख 49 हजार 726 गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच की गई। इनमें से 70 हजार 928 महिलाओं को हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी के रूप में चिन्हित किया गया, जो कुल जांच का 8.38 प्रतिशत है। सारण जिले में इसी अवधि में 36 हजार 687 गर्भवती महिलाओं की जांच हुई, जिनमें 3 हजार 76 महिलाओं को हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी के रूप में चिन्हित किया गया। यहां भी हाई-रिस्क मामलों का प्रतिशत 8.38 रहा। ये आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि नियमित और बार-बार जांच से जोखिम वाली गर्भावस्थाओं को समय रहते चिन्हित किया जा रहा है।
आशा कार्यकर्ता बनीं मजबूत कड़ी
इस अभियान की सफलता में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद अहम है। गांव-टोले स्तर पर गर्भवती महिलाओं को चिन्हित करना, उन्हें शिविर तक लाना, जांच के लिए प्रेरित करना और नियमित फॉलोअप करना उनकी जिम्मेदारी है। मशरक प्रखंड की आशा कार्यकर्ता रेखा देवी कहती हैं, “पहले महिलाएं एक बार जांच कराकर ही संतुष्ट हो जाती थीं। अब महीने में तीन बार कैंप लगने से हम बार-बार जांच करा पा रहे हैं। इससे एनीमिया, बीपी या अन्य खतरे जल्दी पकड़ में आ जाते हैं और समय पर इलाज संभव हो पाता है।”
- डॉक्टरों के लिए भी निगरानी आसान।
छपरा शहर के प्रसिद्ध महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. संजू प्रसाद बताती हैं कि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान से ही मातृ मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है। “पीएमएसएमए के तहत अब तीन बार जांच होने से हमें गर्भवती महिला की स्थिति पर लगातार नजर रखने का मौका मिल रहा है। हाई-रिस्क मामलों में समय पर रेफरल और इलाज से गंभीर स्थिति बनने से पहले ही रोकथाम संभव हो पा रही है।
- एपीएचसी स्तर तक पहुंची सेवाएं।
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान को और मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने इस सेवा का दायरा बढ़ा दिया है। अब यह सुविधा अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (APHC) स्तर तक उपलब्ध करा दी गई है। सारण जिले में दिसंबर 2025 से एपीएचसी स्तर पर भी पीएमएसएमए सेवाएं शुरू हो चुकी हैं। पहले यह सुविधा जिला अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल, रेफरल अस्पताल, सीएचसी और पीएचसी तक सीमित थी। सेवाओं के विकेंद्रीकरण से ग्रामीण महिलाओं को अब नजदीक में ही जांच और परामर्श मिल रहा है।
- नियमित फॉलोअप से बढ़ी सुरक्षा।
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं का स्वास्थ्य विभाग द्वारा नियमित फॉलोअप किया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर उन्हें उच्च संस्थानों में रेफर किया जाता है और दवाओं व जांच की निरंतर निगरानी की जाती है। कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान अब सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं रह गया है, बल्कि यह मां और बच्चे के सुरक्षित भविष्य की गारंटी बनता जा रहा है। जांच का दायरा बढ़ना, समय पर पहचान और सतत निगरानी—यही इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनकर हजारों परिवारों के लिए नई उम्मीद जगा रही है।
- गृह प्रसव से संस्थागत प्रसव की ओर बढ़ता भरोसा।
सिविल सर्जन डॉ राजकुमार चौधरी ने कहा कि पीएमएसएमए के तहत बढ़ी हुई जांच और नियमित परामर्श का एक बड़ा सकारात्मक असर यह भी देखने को मिल रहा है कि जिले में गृह प्रसव की प्रवृत्ति लगातार कम हो रही है और महिलाएं संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता दे रही हैं। बार-बार होने वाली जांच के दौरान डॉक्टरों और एएनएम द्वारा गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों को सुरक्षित प्रसव, संभावित जोखिमों और अस्पताल में प्रसव के लाभों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान होने पर अस्पताल में प्रसव की अनिवार्यता समझाई जाती है, जिससे परिवार खुद ही गृह प्रसव के बजाय सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों का रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी और सुरक्षित प्रसव के रूप में सामने आ रहा है।





















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